Wednesday, January 03, 2007

हिंदी कविता: उजली सी सुबह

अभी कुछ देर हुई आंख खुली है

उजली सी सुबह घर आयी हुई है,

नयी दुल्हन कोई जैसे मॅन-आंगन में

धुप का आलता लगा शर्माई हुई है।


चाय की प्याली में मोगरे की झुकी डाली

किरणों की मिश्री घोल रही है,

खुद ही से छुपाये जाने कितने राज़

कांपते होंठों से आज खोल रही है।


अखबार की खुशबु ताज़ा खबरों की तरह

पूरे कमरे में समां गयी है,

और नयी आशा की किरणों में

घर की हर चीज़ नहा गयी है।


रात भी चांद का कंगन उतार,

आसमान के आगोश में सुस्ताने लौट गयी है,

और जाते जाते तारों की शरारतों को

रौशनी का ताला लगा गयी है।


एक गिलहरी फिर चोरों की तरह

गमले के पीछे सेंघ लगाए बैठी है,

और आंगन में कबूतरों की पंचायत

आज किसी नयी बात पे एन्ठी है।


सर्द हवा में बिखरी

जो यह गुलाब की पंखुरियां हैं,

चांदनी की आंच तले कल रात सिकी

कहानियों की परियां है।


कुछ तो है इस दिन में

के फूल भी मुस्कुराते हैं,

मन ही मन में आज ये और मैं

एक ही गीत गुनगुनाते है।


तुम भी सोचते होगे

ऐसा क्या है इस सवेरे में,

वही रंग हैं आसमान के,

हैं वही लोग इस बसेरे में।


मन जानता है जिसने साल भर

उदासी का कर्ज़ अदा किया है,

बात इतनी है के इस साल मैंने

अपने आप से खुश रहने का वादा किया है।

1 comments:

Shekhar said...

Aren't you amazing? It is a pity that there are no more entries after January 25, 2007. Pardon my blunt remark but you may regret if you lose touch with the wonderful literary streak in you.