Sunday, January 03, 2010

हिंदी लघु कथा: असली नकली

“यह लीजिये पांच सौ का नोट लालाजी. अब आप हमें दो सौ लौटा दीजिये." अहमद साहेब ने अपना राशन का सामान थैले में रखा और साइकिल पर थैले को बाँधने लगे.

"लालाजी, ये नोट तो नकली हैं", दो सौ सौ के करारे नोटों को देखते हुए वो बोल पड़े और नोट वापस लालाजी के हाथ में थमा दिए.

"नकली? अरे क्या कहते हो भैया? हमनें कोई मशीन थोड़े ही लगा रखी है नोट छापने की? हमारे पास भी तो आप जैसे ही ग्राहकों से ही आते हैं सब नोट!"

लालाजी का गुस्सा छुपाये नहीं छुप रहा था. उधर दूकान के अन्दर खड़ा छोटू झाड पोंछ करता हुआ खिसिया के हंस पड़ा. जिस स्टूल पर खड़ा ऊपर से अलमारी साफ़ कर रहा था, उससे उतर कर अपनी गणित की कॉपी निकाली. चार लकीरों को पांचवी लकीर से काट कर जोर से हंसा.

लालाजी ने मन ही मन कहा, "लो, एक बार फिर शर्त हार गया बन्दर से. यह लड़का है बड़ी ऊंची चीज़! बेचारे अहमद भाई पर यूँ ही बरस पड़ा मैं."

थोडा मन शांत किया और बोले, "क्या कहूं भाई जान, मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आता के नकली है या असली. मैं भी तो सोचो ठगा ही तो गया हूँ ना. जाने कौन दे गया होगा यह नोट मुझे! आप तो पुराने ग्राहक हो, अब आप से क्या छुपाना. रातों की नींद हराम हो गयी है मेरी इन नकली नोटों की वजह से. कारोबार का सत्यानास हो चला है. इसीलिए आप पर भी यूँ ही बरस पड़ा. माफ़ करना."

और फिर थोडा हिचकिचाते हुए बोले, "ज़रा हमें भी समझाना कैसे पहचानते हैं नकली नोट..."

"अरे मियां, आप तो वो मशीन ही लगवा लो नोट पहचानने की. कहाँ आप इस उम्र में अपनी आँखों को तकलीफ देंगे. इतना आसान भी नहीं है सिखाना. काफी पेचीदा मामला है. मेरी नमाज़ का भी समय हो रहा है. आप ऐसा करो, यह रखो तीन सौ रुपये. कसम खुदा की, असली नोट दे रहा हूँ. चाहो तो दस्तखत कर दूं. मशीन से चेक करवा लेना. जो नकली निकले तो हाथ के हाथ बदल दूंगा."

अहमद भाई ने साइकिल पकड़ी और निकल पड़े. मन ही मन सोचे जा रहे थे, "अब तो मुन्ने को सामान लेने लाले की दूकान पे भेजना खतरे से खाली नहीं. जाने कब नकली नोट थमा दे मासूम बच्चे की हथेली पर. थोड़ी सी तो दूर है रमेश बनिये की दूकान. चार कीड़े ही तो ज्यादा निकलेंगे चावल में, चिकन बिरयानी समझ के खा लेंगे. और एक बार साइकिल निकाल ही ली तो थोडा आगे जाने में क्या हर्ज़ है? कम से कम नकली नोटों से तो बच जायेंगे."

"बड़ी हंसी आ रही है छोटू बेटा? कोई काम धाम नहीं है क्या? मुफ्त की रोटियां तोड़ने की आदत होती जा रही है. देख तो, किवाड़ के पीछे कितनी धुल है, मार ज़रा कपडा कस के. पता चले लाले की चक्की का आटा खाता है!" अहमद भाई के जाते ही लालाजी छोटू पर बरस पड़े.

"लालाजी, अब तो मान जाओ. कंजूसी छोडो. मसीन ले ही लो. वैसे मेरी हिसाब की किताब के हिसाब से अहमद भाई दसवें आदमी थे आपका नकली नोट पकड़ने वाले. अब तो यह दोनों नोट भी मेरे हुए. लाइए लाइए, दीजिये और फिर देखिये कैसे चकाचक सफाई करता हूँ." छोटू ने भी मुस्कुराते हुए अपनी हथेली आगे रख दी.

"ले रख. नकली नोट! राम राम! लक्ष्मी का ऐसा घोर निरादर! पैसे क्या पेड़ पर लगते हैं जो उस बनारसी बाबू को ज़रा सी मसीन के बावीस सौ पकड़ा दूं! जा जा, काम कर."

"किसी न किसी के आँगन के पेड़ पर तो लग ही रहे हैं न पैसे, लालाजी. जाने कौन है जो आपको नकली के नोट चेपे जा रहा है तीन महीने से. मेरी मानो, एक बार फिर से बुलवा भेजो बनारसी बाबू को. थोडा ठंडा सरबत पिलाओ और फिर मोल भाव करो. लगता है दो हज़ार में मान जाएगा."

अपने बच्चों सा प्यार करते थे लालाजी छोटू को. मेहनती बच्चा था. कभी मेहनत से जी नहीं चुराया उसने. वो भी बड़ा मान करता था लालाजी का. पर जहां पैसे खर्च करने की बात आती थी, दिल बैठा जाता था लालाजी का.

"सोचूंगा. तू जा काम कर अपना. देख तो, मूंग की दल में किल्ली पड़ने को है. पिछवाड़े ले जाकर धूप में रख कर आ बोरे को."

छोटू तो अपना कपडा कंधे पे डाल बोरा उठा के गायब हो गया. लालाजी बेचारे चिंतित से मक्खियों पर झल्लाने लगे.

"नाक में दम कर रखा है इन मुई नकली मक्खियों ने!"

नकली नोटों ने दिमाग पर ऐसा कब्ज़ा किया हुआ था के सभी कुछ नकली नज़र आने लगा था लालाजी को.

"वोह राम दयाल भी, लालाजी लालाजी कहता नहीं थकता था, कल अगली गली के बनिये के पास से थैला भर के लाता दिखा था. ऐसे तो मेरा काम काज सब चौपट हो जाएगा."

मोटे लालाजी नन्हे बालक की तरह रुआंसे हो चले.

*
बस पौ फटने ही वाली थी. बनियाइन आँगन में अपने भीगे बाल सुखा रही थी और मन ही मन गायत्री मंत्र का जाप कर रही थी जब लालाजी के चिल्लाने की आवाज सुन कर घबरा गयी. दौड़ कर कमरे में पहुंची तो देखा लालाजी अपने दिल पर हाथ रखे उठे बैठे हैं. फ़ौरन पास रखे मटके से एक गिलास पानी निकालकर लालाजी तो दिया और पीठ मसलने लगी.

"क्या हुआ जी आपको?"

"क्या बोलूं मुन्नी की माँ, इतना सुहाना सपना देख रहे थे हम... इतनी, इस किवाड़ जितनी, बड़ी तिजोरी थी जिसमें भरे थे हीरे जवाहरात और नोटों की गद्दियाँ. इतने नोट थे के हम खुद नोटों के ढेर पर बैठे थे और आप बनारसी साडी पहने, सोने से लबालब, चांदी की थाली में गरम गरम मालपुए परोस रही थीं. बस चाशनी से भरा पहला निवाला अभी मुख में जाने ही वाला था के कहीं से छोटू भागता हुआ आया और बोला 'लालाजी सब नकली है - नोट, शोट, सोना चांदी...यहाँ तक के माल पुए भी. भाग लो, सारा गाँव आपको मारने आ रहा है...' बस हम हडबडा के उठ गए."

"धीरज रखिये जी. मेरी मानिए लगवा ही लीजिये वो मसीनवा. ऐसे में आपको कुछ हो जाए तो सबही कुछ धरा का धरा ही रह जाएगा."

दुनिया की हर मिस्सेज़ अपने मिस्टर को ऐसी परिस्थिति में यही कहती है. पर फिर भी दुनिया के हर मिस्टर की तरह लालाजी को भी अपनी मिस्सेज़ की बात बड़ी ही गहरी लगी. वैसे तो रोज़ अपनी पत्नी की आवाज़ कानों में चुभती है, पर आज उन्हें उनकी जिव्हा पर सरस्वती का वास नज़र आ रहा था. बोले, "बात तो तुम्हारी सोलह आने खरी है मुन्नी की माँ. अब तो हमने ठान ही ली है. मसीन लगवा कर ही दम लेंगे."

*
"अरे छोटू, आज हमने सोच ही लिया है. अब मसीन लगवा ही लेते हैं. बहुत ठग लिया हमको दुनिया ने. अरे, ऐसे में हमको कुछ हो जाए तो सबही कुछ धरा का धरा ही रह जाएगा.",

कोई कह नहीं सकता था के अपनी मिस्सेज़ के शब्द चुरा के बोल रहे हैं लालाजी.

"क्या बात है, लालाजी! आज तो मैं भी आपके लिए बढ़िया खबर लाया हूँ. सुन कर बांछें खिल जायेंगी आपकी! पहले वादा करिए के गुलाब जामुन खिलाएंगे, फिर बताता हूँ."

"क्या खबर लाया है? सुबह सुबह अभी लक्ष्मी आनी तो शुरू नहीं हुई, उसके जाने का प्रबंध हो रहा है. ऐसे में क्या अच्छी खबर ला सकता है?" लालाजी भारी मन से बोले.

"तो फिर सुनो. वो जो बनारसी बाबू हैं न, जो दूकान दूकान साइकिल पर नोट चेक करने की मसीन बेचने को आये थे, बस यूँ समझो, हमारे दूर के रिश्तेदार हैं."

"दूर के?"

"बस, वो ऐसा है न के, माँ ने मेरी बात चलाई हुई है... सादी की..." छोटू थोडा शर्माते हुए बोला. "वोह लड़की है न, उसके पिताजी के ममेरे भाई के बेटे ही तो हैं वोह बनारसी भैया... बस यूँ ही राह चलते मिल गए थे मुझे कल, और बात बात में बात निकल ली. कहने लगे अपनी बेटी के होने वाले ससुराल से भला कमिसन क्या कमाएंगे... पूरे सोलह सौ में बात पक्की कर के आया हूँ. मैंने कहा लालाजी को बता दूंगा, फिर वो अपनी सूझ बूझ से बात फाइनल करेंगे."

"अरे वाह! जा जा, जल्दी से लेके आ. इससे पहले के लड़की वाले तेरी सूरत देख कर रिश्ते से इनकार कर दें, तू मसीन लेके आ." लालाजी ने फ़ौरन छोटू को पैसे थमा दिए.

*
चमचमाती मसीन आई दूकान पर. लालाजी ने उसे फूल माला पहना कर, धूप बत्ती करके अपनी दूकान के द्वार के पास ऐसे सजा के रखा के हर आने जाने वाले की नज़र उस पर पड़ती थी. उस पर रोज़ दबा के कपडा मारना छोटू का काम था.

सबसे पहले तो उन्होंने अपने गल्ले के सारे नोट चेक कर डाले. ज्यादा नहीं, बस तीन पचास के, एक सौ का और पांच दस दस के नोट नकली बताये मसीन ने. हिसाब करके मन ही मन सोचा लालाजी ने एक मसीन फिर भी दो हज़ार से कम की पड़ी छोटू की वजह से. ख़ुशी ख़ुशी छोटू के लिए अगले दिन गुलाब जामुन बनवाये.

*

छोटू का रिश्ता तो हुआ नहीं उस घर, पर लालाजी का काम बन गया था. यही कोई दो-तीन हफ्ते ही बीते थे के एक दिन, लक्ष्मी मैया के आगे अगरबत्ती जलाते हुए न जाने लालाजी को क्या सूझा और छोटू से पूछ बैठे,

"क्या बताया था तूने? वोह बनारसी बाबू तेरा दूर का चचेरा भाई निकला था...? कोई और भी पूछ रहा था हमें मसीन के बारे में, इसीलिए उसकी याद आई..."

"अरे नहीं लालाजी, मेरा भाई नहीं, वो लड़की के बापू के चचेरे भाई का बेटा था वो... इसी लिए तो इतना दिश्कोउंत दिया था...आज कल तो अपना खुद का भाई भी कमिसन न छोड़े..."

"तुझे ठीक से याद है न वो चचेरे भाई का बेटा था?“ लालाजी ने पूछा.

"हाँ लालाजी, अगर बात बन जाती तो साला ही न बनता मेरा वोह? वैसे वो लोग तो कहते थे के लड़का लाखों में एक है, बस मेरी माँ ही अटक गयी के दहेज़ में स्कूटर मिलेगा तो ही ब्याहेगी बेटे को." छोटू भी कहने से न चूका.

लालाजी मन ही मन मुस्कुराए, "मैं न कहता था के ऊंची चीज़ है यह लड़का. पहले बोला था ममेरा भाई है, अब कहता है चचेरा भाई है. नकली नोट दे कर मसीन खरीद लाया होगा. बदमाश, मुझसे सोलह सौ ले गया. जी तो चाहता है डंडा उठा के मारूं इसके, पर भेद खोल दिया तो नौकरी छोड़ देगा. अगली गली वाले का छोटू तो पहले ही भाग खड़ा हुआ है धोबी की लड़की के साथ. फ़ौरन जाकर उसकी दूकान पे काम पर लग जाएगा. क्या करूं?"

फिर कुछ सोच कर मन ही मन बोले, "लड़का तो काम का है. अपने हाथ में रखूंगा तो मेरे ही काम आएगा बच्चा कल को. चलो, ये समझूंगा आखिरी बार नकली नोटों से ठगा गया हूँ. बस आगे से नज़र पक्की रखूंगा इस पर."

फिर याद आया,

"वादा किया है मिस्सेज़ ने के इसके बेटा होगा तो चांदी के कटोरी-चम्मच देंगी इसकी बहू को. अब मेरी नज़र तो कमज़ोर होती जा रही है, कौन जाने असली और नकली चांदी के भेद को? राम राम, यह सुनार भी तो ठग बनते जा रहे हैं आज कल."

सब दुःख भूल कर लालाजी अपने बही खाते खोलने में व्यस्त हो गए.

5 comments:

Anonymous said...

Interesting story. Perhaps Chotu's character could have been developed a bit more.

Though the story is about a kanjoos bania I like the way it brings out our chalta-hai attitude. We are happy as long as things work for us without looking at or caring for the bigger picture.

My Alter Ego said...

Thanks Anonymous. You have a good point. Chhotu does not seem to gotten enough spot light. Will try to fix it if you promise to reveal your identity. :)

Anonymous said...

Interesting.But I like your stories in english far more humourous and witty.

Anonymous said...

I liked the way the story is narrated. The characters are realistic and can be related to easily. From the very beginning,it was quite clear the Chhotu was up to mischief but still the gripping narration kept me going till the end. The social milieu has also been very aptly depicted.

Geetashree

Smita Luthra said...

Thank you Geetashree. Thanks for reading the story. It is an honour to note that you liked my work. :)