उलझी सी लकीरें मुट्ठी में लिए,
चले जाते हैं वीरानों में नयी सड़क तलाशते हुए
कभी अपनों को ढूंढते हुए,
कभी अपनों में खुद को तलाशते हुए
दिन की स्याही से लिखते हैं कहानी अपनी,
जीतते इंसानों से, सवालों से मगर हारते हुए
कभी आँधियों का रुख बदल देते हैं,
कभी चल देते हैं हवाओं की ऊँगली थामते हुए
चाँद को बंदी बना लेते हैं सपनों में कभी,
कभी ढलते सूरज की गोद में खुद को ढालते हुए
चले जाते हैं वीरानों में नयी सड़क तलाशते हुए
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